हम लोग और हमारा लोकतन्त्र

लोकतन्त्र अर्थात लोगों का तन्त्र. तन्त्र जिसे लोग समझें, बनायें और अपनाएँ I जहाँ तक भारतीय लोकतंत्र का सवाल है, निसंदेह इसे भारत के लोगों ने बनाया और एक प्रणाली के तौर पर चुना, लेकिन क्या हमने इसे सही मायने में अपनाया है? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है I

किसी भी देश का भविष्य केवल उसकी शाशनप्रणाली या उसकी सरकार पर निर्भर नहीं करता बल्कि उस देश के नागरिकों का क्या योगदान है, इस पर भी बहुत ज़्यादा निर्भर करता है I प्राय: हम लोग इस पर विचार करते हैं कि हमारी सरकार क्या कर रही है या क्या नहीं कर रही है और यह एक सचेत नागरिक का अधिकार और ज़िम्मेवारी है I किंतु बहुत कम बार हम इस विषय पर चिंतन करते हैं कि इस देश के नागरिकों का क्या दायित्व और योगदान है? देश की वर्तमान स्थिति के लिए जितनी ज़िम्मेदारी सरकारों की रही है उससे कहीं अधिक इसके नागरिकों की I

अधिकतर गावों में लोगों को उनकी चुनी हुई पंचायतों से शिकायत है कि विकास के काम पूरे नहीं होते और सरकार के द्वारा दी हुई राशि में पंचायते अधिकतर भ्रष्टाचार में लिप्त होती हैं I यह एक कड़वा सत्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इससे भी कड़वा सच यह है की जब भी पंचायते ग्राम सभा का आयोजन करती हैं, गाँवके लोगों की उपस्थिति नाम मात्र होती है I  ग्राम सभा में नागरिकों को यह अवसर होता है कि वे अपनी पंचायत के सभी विकास कार्यों की समीक्षा करें I  ह्म अपनी पंचायत तो चुनते हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि उसकी समीक्षा की ज़िम्मेदारी से दूर भागते हैं I परिणाम यह है कि लोक्तन्त्र के आधारभूत ढाँचे “पंचायत” पर आज प्रश्नवाचक चिन्ह है I

लोकतन्त्र में हर विधायक से ये अपेक्षा रहती है कि वह अपनी दूरदर्शिता से क्षेत्र में विकास, रोज़गार, स्वास्थ्य और जन-कल्याण के हित में काम करे I प्राय: विधायक इस अपेक्षा की उपेक्षा करते हैं, लेकिन क्या चयन करने वाली जनता इस उपेक्षा के लिए ज़िम्मेदार नहीं? मैनें अपने सीमित सामाजिक अनुभव में लोगों को स्थानीय विधायक से अधिकतर सरकारी कर्मचारियों के तबादलों, बेटे या बेटी के रोज़गार की सिफारिश, किसी निजी व्यवसाय के लिए लाइसेन्स इत्यादि निजी कामों के लिए मिलते या निवेदन करते देखा है I ऐसे अवसर बहुत कम मिलते हैं जब हम लोग मिलकर अपने विधायक से किसी इंडस्ट्री, अस्पताल या फिर सार्वजनिक परिवहन समस्याओं के निवारण के लिए निवेदन करते हैं या फिर उसके लिए आंदोलन करते हैं I यह एक विडंबना है कि तंत्र व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ग्रसित एक व्यक्ति तक सीमित रह जाता है I अब इसे क्या आप लोकतंत्र कहेंगे या व्यक्तितन्त्र?

शाशन के द्वारा संचालित अधिकतर स्कूलों में शिक्षा का स्तर इतना निम्न है कि निजी संस्थानों के बिना शिक्षा का भविष्य नज़र नही आता I सरकारी स्कूलों में शिक्षक और शिक्षुओं की क्षमता को किसी भी स्तर पर निजी संस्थानों से कम नही आँका जा सकता लेकिन अंतर सिर्फ़ व्यवस्था में है I अधिकतर शिक्षक स्कूलों मे अनुपस्थित रहते हैं I अभिभावक और शिक्षक संगठन तो ज़रूर बनाया जाता है लेकिन कभी इस बात का संज्ञान नहीं लिया जाता कि शिक्षक स्कूल आते हैं या नहीं? आरक्षण, राष्ट्रवाद और गैर-राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर तो हम आंदोलन करते हैं लेकिन राष्ट्र का भविष्य जो हमारे बच्चों की शिक्षा पर निर्भर है, इस विषय पर हम पूर्णता “शांति” का योगदान देते हैं I

“भारत एक कृषि प्रधान देश है” I मैनें और आप सब ने बचपन में ‘सामजिक-ज्ञान’ में एक अध्याय ज़रूर पढ़ा होगा I प्रधान तो हम कई क्षेत्रों में हो गये लेकिन दुर्भाग्यवश कृषि के अध्याय को जैसे दीमक ने खा लिया हो I गाँव से शहर की तरफ काफिला ऐसे चला कि आजतक थमा ही नहीं I  मराठवाडा, बुदेलखंड और अन्य कई क्षेत्रों में सूखा पानी की कमी से नहीं बल्कि इस लोकतंत्र के लोगों की पिछ्ले कई दशकों की उदासीनता का प्रमाण है I आज से लगभग १५ वर्ष पहले नदियों को जोड़ने की बात कही गयी थी I  नदियों में आज भी बाढ़ आती है और खेतों में सूखा. सरकारें तो असफल रहीं लेकिन सरकारों से ज़्यादा हम लोग स्वयं नाकाम रहे I मंडल, कमंडल, जाट और गुज्जर आरक्षण मुद्दों पर तो हमने सियासत के सिहांसन हिला दिए फिर किसान और खेती के लिए हमारी आवाज़ खामोश क्‍यों? शायद इसलिए क्योंकि हमारे व्यक्तिगत हित लोकहित से कहीं उपर हैं I

सौंदर्य बोध और शक्ति बोध के बारे हर छात्र पढ़ता है लेकिन जब वही छात्र एक परिपक्व नागरिक बनता है तो लोकतंत्र के तराजू में कर्तव्य की तुलना में अधिकार भारी हो जाते हैं I अगर ऐसा नहीं होता तो ‘बस ठहराव’ पर धक्का-मुक्की न होती, हर रेल टिकेट खिड़की पर कतार नज़र आती, हर सार्वजनिक परिसर स्वच्छ होता I अब इस बात पर विवाद ज़रूर हो सकता है कि जनसंख्या ज़्यादा है और संसाधन कम और इसीलिए ऐसी अनुशासनहीनता स्वाभाविक है I लेकिन फिर प्रश्न इस बात का है कि पिछले ६९वर्षों में हम सब इस विषय पर चुप क्यों हैं?

इस लोकतंत्र को जगाने के लिए हमें एक कर्मयोगी कृष्ण की ज़रूरत है, जो अर्जुन को राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ा सकें, निर्धन सुदांमा को गले लगा सकें I  . एक जननी की आवश्यकता है जो एक और मोहनदास कर्मचंद गाँधी पैदा करे और लोगों को अपनी ताक़त का एहसास करवाए और एक जयप्रकाश नारायण जो महत्वकांक्षा से परे हो कर लोकांक्षा पर ध्यान केंद्रित करे I लेकिन ये भी इसी समाज से पैदा होंगे और समाज को पैदा करने होंगे I

इतिहास इस बात का साक्षी है कि हर समाज या देश को वही मिला है जो उसने बुलंद आवाज़ में माँगा और उसके लिए संघर्ष किया है I

लोग बदलें तो तंत्र बदलेगा, लोग चलें तो लोकतंत्र चलेगा !